राजनीतिक

लौट रहे हैं सबको साथ लेने वाले शिवराज

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नई दिल्‍ली
दिसंबर 2018 में जब 15 साल के शासन के बाद जनता मध्‍य प्रदेश की भाजपा सरकार को सत्‍ता से बेदखल कर दिया और कांग्रेस को गद्दी पर बैठाया, तो भी बीजेपी ने कभी नहीं माना कि वह सत्‍ता से बाहर है. कमलनाथ सरकार बनने के बाद बीजेपी ने प्रदेश में होने वाली बिजली कटौती पर तंज किया, अभी इनर्वटर मत खरीदना, मैं जल्‍दी वापस आ जाऊंगा. वहीं पार्टी महासचिव कैलाश विजयवर्गीय ने वह मशहूर बयान दिया कि अगर पार्टी आला कमान छींक दे तो मध्‍य प्रदेश की सरकार गिर जाएगी. इस तरह बीजेपी यह मानकर चल रही थी कि जैसे बाकी राज्‍यों कांग्रेस की सरकार गिरी है, वैसे ही मध्‍य प्रदेश में गिराई जाएगी.

बीजेपी के भीतर असल सवाल यह था कि अगला मुख्‍यमंत्री कौन बनेगा. शिवराज सिंह चौहान और पार्टी के शीर्ष नेतृत्‍व के बीच जिस तरह के रिश्‍ते अतीत में रहे थे, उससे यह अटकलें लगती थीं कि कम से कम शिवराज की वापसी तो नहीं होगी. उनके विकल्‍प के तौर पर नरेंद्र सिंह तोमर, नरोत्‍तम मिश्रा और यहां तक कि प्रदेश अध्‍यक्ष बी डी शर्मा के नाम भी चलते रहे. इसके अलावा बीजेपी की परंपरा के मुताबिक इस बात की अटकल तो हमेशा लगती ही रही कि मध्‍य प्रदेश में कभी भी कोई अनजान लेकिन घुटा हुआ स्‍वयं सेवक सीएम की कुर्सी पर बैठ सकता है.

जब कमलनाथ सरकार वाकई गिर गई तो केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर का नाम काफी आगे चला. इसकी एक वजह तो यह थी कि यह सरकार कांग्रेस ने बीजेपी में आए ज्‍योतिरादित्‍य सिंधिया की मेहरबानी से बनी है. सिंधिया और तोमर चंबल के इलाके से आते हैं. इसी इलाके से बी डी शर्मा भी आते हैं. ऐसे में यह माना गया कि सिंधिया लाने में तोमर और शर्मा की बड़ी भूमिका है. जिस तरह से कांग्रेस की विधायकी छोड़ने वाले नेताओं के भाजपा में शामिल होने के मौके पर तोमर मौजूद रहे, उससे भी उनकी दावेदारी को वजन मिला.

लेकिन यह सब होने के दौरान शिवराज सीहोर में रुके बीजेपी विधायकों के साथ रिसॉर्ट में क्रिकेट खेलते दिखे. उन्‍होंने अपनी बल्‍लेबाजी और गेंदबाजी के वीडियो शेयर किए और साथ ही क्रिकेट की भाषा में पूछा हाउज देट यानी यह कैसे हुआ. क्रिकेट में जब गेंदबाज एंपायर के सामने विकेट की अपील करता है तो इन्‍हीं शब्‍दों का इस्‍तेमाल करता है.

असल में शिवराज इस खेल के पुराने खिलाड़ी हैं. पार्टी के भीतर और यहां तक कि पार्टी के बाहर भी उनके घोषित दुश्‍मन कम हैं. 2004 में जब वे पहली बार मुख्‍यमंत्री बने थे, तब भी उनकी मुख्‍य योग्‍यता सर्वस्‍वीकार्यता ही थी. उमा भारती और बाबूलाल गौर के विवाद के बीच पार्टी ने अपने विदिशा के सांसद को मुख्‍यमंत्री की कुर्सी सौंपी थी. उनसे किसी को भय नहीं था. वे दो प्रतिद्वंद्वी राजनैतिक जातियों ठाकुर और ब्राह्मण दोनों की बजाय पिछड़ा वर्ग से आते हैं. जब तक बीजेपी लालकृष्‍ण आडवाणी की चलती रही, वे उनके साथ बने रहे. लेकिन जब मोदी युग का सूर्य उगा तो उन्‍होंने नए निजाम के साथ प्रतिबद्धता जताने में देर नहीं की.

जिस तरह 2004 में बीच के आदमी थी, उसी तरह 2020 में भी वे सबको साथ लेने का हुनर रखते हैं. इसके अलावा मामूली बहुमत, सिर पर टंगे 20 से अधिक सीटों के उपचुनाव और कांग्रेस के पटलवार की आशंकाओं के बीच पार्टी एमपी की कमान अनुभवी हाथों में देना चाहती है. शिवराज के लिए सभ देखाभाला है. उन्‍हें कोई नये प्रयोग नहीं करने हैं, जहां से छोड़ा था, वहीं से शुरू करना है. वैसे भी मध्‍य प्रदेश की जनता ने अब तक इनवर्टर नहीं खरीदे हैं और मामा जी का पावर कनेक्‍शन जुड़ ही गया है. शिवराज की नई पारी प्रदेश और पार्टी दोनों के इतिहास पर छाप छोड़ेगी.

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