दिल्ली/नोएडाराज्य

अभी निकले, तो कम से कम जिंदा अपने गांव पहुंच जाएंगे… लोग पैदल ही दिल्ली से चल दिए यूपी

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 नई दिल्ली
दिल्ली के गाजीपुर बॉर्डर पर दिल्ली और यूपी पुलिस के कड़े पहरे के बीच 20-21 साल के कुछ लड़के सिर और कंधों पर बैग लादे पैदल चलते जा रहे थे। उनके चेहरे देखकर यह अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं था कि वह काफी दूर से पैदल चलते हुए आ रहे थे। किसी ने मास्क पहना था, तो किसी ने मुंह पर रूमाल बांधा हुआ था। सब आपस में थोड़ी दूरी बनाकर चल रहे थे। तभी बॉर्डर पर तैनात एक पुलिसकर्मी ने उन्हें रोक कर पूछा, कहां जा रहे हो?

उनमें से एक लड़के ने बताया कि वे लोग हापुड़ जा रहे हैं। पुलिसवाले ने पूछा कि इतनी दूर कैसे जाओगे? बस-ट्रेनें तो चल नहीं रही हैं और दूसरी गाड़ियां भी बंद है? लड़के ने कहा कि कोई साधन नहीं मिला, तो पैदल ही जाएंगे। पूछताछ में पता चला कि वे लोग गांधी नगर इलाके में दिहाड़ी पर मजदूरी करते थे, लेकिन लॉकडाउन से उन्हें कोई काम नहीं मिल पा रहा है। उनके पास जितने पैसे थे, वह भी अब खत्म होने को आए हैं, इसलिए वे घर लौट रहे हैं।
पुलिसवाले ने उन पर तरस खाते हुए पूछा कि साथ में कुछ खाने-पीने के लिए है या नहीं? इस पर लड़के और उसके साथियों ने अपने बैग पर हाथ रखते हुए कहा कि हां, खाने का सामान है। तभी एक लड़के ने बताया कि पीने का पानी खत्म हो गया है। इस पर पुलिसवाले ने अपने पास रखी कैन से उसकी बोतल में पानी भरा और सभी लड़कों को पानी पिलाया। इसके बाद उन्हें जाने दिया।

दिहाड़ी मजदूरों का रोजगार हुआ ठप
कोरोना की वजह से जब से दिल्ली-एनसीआर में तमाम काम-धंधे ठप हुए हैं, तब से उन लोगों का यह हाल है, जो रोज मेहनत करके कमाते थे और शाम को चूल्हा जलाते थे। यूपी-बिहार से आए नौजवान और बड़ी उम्र के भी ऐसे तमाम लोगों के सामने अब जिंदगी के साथ-साथ रोजगार का संकट पैदा हो गया है। ऐसे में उन्हें फिलहाल घर लौटना ही बेहतर लग रह है। सरकार के तमाम आश्वासनों के बावजूद न तो अपने मालिकों की तरफ से उन्हें कोई मदद मिल रही है और ना मकान मालिक या राशन देने वाले उन पर तरस खा रहे हैं। ऐसे में दिल्ली से अब बड़ी संख्या में लोगों का पलायन शुरू हो गया है और कोई साधन नहीं मिलने के बावजूद लोग पैदल ही अपने घरों के लिए निकल गए हैं।

पीएम के संबोधन के बाद चल पड़े लोग
वैसे तो यह पलायन चार-पांच दिन पहले से ही शुरू हो गया था, लेकिन मंगलवार की रात जब प्रधानमंत्री ने पूरे देश में 21 दिनों के कंप्लीट लॉकडाउन की घोषणा की, तो उसके बाद इन लोगों की उम्मीद ही टूट गई। मंगलवार रात से ही बड़ी तादाद में लोग अपना बिस्तर बांधकर यूपी, बिहार, हरियाणा, राजस्थान और पंजाब में स्थित अपने घरों के लिए निकल पड़े। ऐसे लोगों का कहना था कि अगर यहां रहे, तो कोरोना से पहले भूख से मर जाएंगे। अभी निकलेंगे, तो कम से कम जिंदा अपने गांव तक तो पहुंच जाएंगे। जब हालात सुधर जाएंगे, तो वापस आ जाएंगे।

ब्रह्मपुरी में जींस की एक फैक्ट्री में काम करने वाले ऐसे दर्जनों कारीगार मंगलवार रात जीटी रोड से गाजियाबाद की तरफ जाते दिखे। उनमें से एक गोपाल ने बताया कि मालिक ने फैक्ट्री पर ताला लगा दिया है। सबको घर जाने के लिए कह दिया है। पैसे मांगने पर मालिक ने कह दिया कि अभी तो उसकी ही आर्थिक हालत खराब है। वह अभी किसी को पैसे नहीं दे सकता। इसी वजह से अब उनके पास घर जाने के अलावा और कोई चारा नहीं बचा है। केवल ब्रह्मपुरी ही नहीं, बल्कि सीलमपुर, जाफराबाद, मौजपुर, वेलकम, गांधी नगर, कैलाश नगर, भजनपुरा, झिलमिल और शास्त्री पार्क इलाके की ऐसी ही फैक्ट्रियों में काम करने वाले सैकड़ों अन्य मजदूरों का भी यही हाल है। कोरोना के संकट के साथ-साथ अब उनके सामने जीवनयापन का भी संकट पैदा हो गया है।

साउथ दिल्ली से यूपी तक पैदल जा रहे लोग
गाजीपुर बॉर्डर पर मिले मोहित, अवधेश, धीरपाल, अरविंद और उनके साथियों ने बताया कि वह दक्षिणपुरी में रहते हैं और वहीं पर दिहाड़ी मजदूरी करते हैं। दो-तीन दिन से उन्हें कोई काम नहीं मिल रहा है। उनका रहना मुश्किल हो रहा था। परिवहन के साधन बंद होने के बावजूद सभी पैदल यूपी के बदायूं जाने के लिए अपने घर से निकल पड़े थे। अवधेश ने बताया कि हमारे पास न पैसा है, न खाने-पीने को कुछ बचा है। ऊपर से मकान मालिक किराया मांग रहे हैं। जब हमें काम नहीं मिल रहा, तो हम किराया कहां से देंगे। इसीलिए अभी हम वापस गांव जा रहे हैं।

अशोक विहार के गोपाल ने बताया कि वह भी पैदल ही यूपी के बहराइच जाने के लिए घर से निकले हैं। क्योंकि अब उन्हें कोई काम नहीं मिल रहा। वह अशोक विहार में गैस पाइप का काम करते थे। महिपालपुर में कबाड़ी का काम करने वाले मोहम्मद अनवर मलिक ने बताया कि पैसे खत्म हो गए हैं और बड़ी मुश्किल से किसी से 300 रुपये उधार लेकर आया हूं। मुझे सिंभावली जाना है। अगर कोई साधन नहीं मिला, तो 60-70 किमी पैदल ही चला जाऊंगा, मगर अब दिल्ली में रुके रहने का कोई मतलब नहीं है। यहां रहा, तो भूखों मरने की नौबत आ जाएगी।

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